शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद यौन उत्पीड़न मामला इन दिनों राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है। धार्मिक जगत से जुड़े इस संवेदनशील प्रकरण में अब कानूनी प्रक्रिया तेज हो गई है। अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रस्तावित है, जहां जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा की सिंगल बेंच इस मामले को सुनेगी।
मामला कैसे शुरू हुआ?
इस केस की शुरुआत तुलसी पीठाधीश्वर स्वामी रामभद्राचार्य के शिष्य आशुतोष ब्रह्मचारी द्वारा दायर याचिका से हुई। धारा 173(4) के तहत जिला न्यायालय में अर्जी दी गई, जिसके बाद स्पेशल POCSO कोर्ट के आदेश पर झूंसी थाने में FIR दर्ज की गई।
FIR में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद, उनके शिष्य मुकुंदानंद और 2–3 अज्ञात लोगों को आरोपी बनाया गया है। आरोप है कि कुछ नाबालिग बटुकों के साथ कुकर्म किया गया।
घटनाक्रम की पूरी टाइमलाइन
18 जनवरी
प्रयागराज माघ मेले में मौनी अमावस्या के दिन प्रशासन और शंकराचार्य के बीच विवाद हुआ।
24 जनवरी
आशुतोष महाराज ने पुलिस कमिश्नर से शिकायत कर माघ मेला-2026 और महाकुंभ-2025 के दौरान यौन शोषण के आरोप लगाए।
8 फरवरी
पुलिस कार्रवाई न होने पर स्पेशल POCSO कोर्ट में याचिका दाखिल की गई।
13–21 फरवरी
दो बच्चों के बयान कोर्ट में दर्ज किए गए।
21 फरवरी
कोर्ट आदेश के बाद झूंसी थाने में FIR दर्ज।
24 फरवरी
शंकराचार्य ने प्रयागराज के एडिशनल कमिश्नर अजय पाल शर्मा पर साजिश का आरोप लगाया और हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दाखिल की।
26 फरवरी
मेडिकल रिपोर्ट सामने आई। पुलिस सूत्रों के अनुसार रिपोर्ट में शोषण की पुष्टि होने का दावा किया गया।
शंकराचार्य का पक्ष
काशी में मीडिया से बातचीत के दौरान शंकराचार्य ने कहा कि वे अदालत में मजबूती से अपना पक्ष रखेंगे। उन्होंने कहा कि सच सामने लाने के लिए नार्को टेस्ट सहित जो भी कानूनी प्रक्रिया आवश्यक हो, वह की जानी चाहिए।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली तो वे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे।
धमकी प्रकरण भी जुड़ा
इस मामले के बीच शंकराचार्य के वकील श्रीनाथ त्रिपाठी को बम से उड़ाने की धमकी मिली। आरोपी अजीत कुमार सरोज को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ में उसने बताया कि उसने पड़ोसी को फंसाने के लिए मैसेज भेजा था।
कानूनी और सामाजिक महत्व
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद यौन उत्पीड़न मामला केवल एक आपराधिक केस नहीं, बल्कि धार्मिक प्रतिष्ठा, सामाजिक विश्वास और न्यायिक प्रक्रिया की परीक्षा भी बन गया है।
POCSO जैसे संवेदनशील मामलों में अदालत का अंतिम निर्णय ही निर्णायक माना जाता है। ऐसे मामलों में जांच, साक्ष्य और न्यायिक प्रक्रिया को निष्पक्ष तरीके से पूरा किया जाना अत्यंत आवश्यक है।
निष्कर्ष
फिलहाल सभी की निगाहें इलाहाबाद हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। अग्रिम जमानत पर फैसला इस पूरे मामले की दिशा तय कर सकता है।
जब आरोप गंभीर हों, तो कानून और न्याय व्यवस्था पर भरोसा रखना ही सर्वोत्तम मार्ग है। अंतिम निर्णय अदालत के हाथ में है।
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