फाल्गुन पूर्णिमा 2026 का महत्व
फाल्गुन पूर्णिमा 2026 इस वर्ष 2 मार्च को मनाई जाएगी। इसी रात होलिका दहन होगा। अगले दिन रंगों की होली खेली जाएगी।
यह पर्व धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। दरअसल, इसी समय से बसंत ऋतु का आगमन माना जाता है। इसलिए इसे नवजीवन का प्रतीक भी कहा जाता है।
खेतों में सरसों के पीले फूल खिलते हैं। आम के पेड़ों पर बौर आ जाते हैं। साथ ही मौसम सुहावना हो जाता है।
पौराणिक कथा क्या कहती है?
शिव पुराण में एक प्रसिद्ध कथा मिलती है। देवी सती के देह त्याग के बाद भगवान शिव गहरे ध्यान में लीन हो गए।
उधर असुरराज तारकासुर ने कठोर तप किया। इसके बाद ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए। उसने वरदान मांगा कि उसकी मृत्यु केवल शिव पुत्र से हो।
वरदान मिलते ही उसका आतंक बढ़ गया। इस कारण देवता चिंतित हो उठे।
कामदेव और बसंत ऋतु
देवताओं ने समाधान खोजा। अंततः उन्होंने कामदेव से सहायता मांगी।
फाल्गुन पूर्णिमा के दिन बसंत ऋतु प्रकट हुई। वातावरण सुगंधित और शांत हो गया। वहीं शीतल हवाएं चलने लगीं।
गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि ऋतुओं में वे स्वयं बसंत हैं।
बसंत के प्रभाव से शिव जी का ध्यान भंग हुआ। हालांकि क्रोध में उन्होंने तीसरा नेत्र खोल दिया। परिणामस्वरूप कामदेव भस्म हो गए।
आगे क्या हुआ?
देवताओं ने प्रार्थना की। इसके बाद शिव जी का क्रोध शांत हुआ।
रति के निवेदन पर शिव जी ने वरदान दिया। उन्होंने कहा कि कामदेव द्वापर युग में प्रद्युम्न के रूप में जन्म लेंगे।
बाद में शिव जी ने माता पार्वती से विवाह किया। अंततः उनके पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध किया।
फसल और उत्सव की परंपरा
फाल्गुन पूर्णिमा के आसपास रबी की फसल पकने लगती है। इसलिए किसान इस समय विशेष उत्सव मनाते हैं।
नई फसल की खुशी में लोग रंग-गुलाल उड़ाते हैं। साथ ही मिठाइयां बांटी जाती हैं।
ग्रामीण परंपरा के अनुसार, होलिका की अग्नि में नई फसल अर्पित की जाती है। इस प्रकार प्रकृति और ईश्वर के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है।
निष्कर्ष
फाल्गुन पूर्णिमा 2026 केवल एक पर्व नहीं है। बल्कि यह आस्था, प्रेम और नवसृजन का प्रतीक है।
इस दिन हमें सकारात्मक सोच अपनानी चाहिए। साथ ही जीवन में नए अवसरों का स्वागत करना चाहिए।
✨ आप सभी को फाल्गुन पूर्णिमा 2026 की हार्दिक शुभकामनाएं।
