आवारा कुत्तों के हमलों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: बच्चे या बुजुर्ग की मौत पर राज्य सरकार होगी जिम्मेदारदेश के कई शहरों और कस्बों में आवारा कुत्तों के हमलों पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता जायज़ मानी जा रही है। आए दिन बच्चों, बुजुर्गों और राहगीरों पर कुत्तों के झुंड द्वारा हमला किए जाने की घटनाएं सामने आ रही हैं। कई मामलों में ये हमले जानलेवा साबित हुए हैं, लेकिन इसके बावजूद स्थानीय प्रशासन की ओर से प्रभावी कार्रवाई नहीं हो रही।
🐕 सड़कों पर बढ़ते हमले, कोर्ट की चिंता
देश के कई शहरों और कस्बों में आवारा कुत्तों के हमले पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता जायज़ मानी जा रही है। आए दिन बच्चों, बुजुर्गों और राहगीरों पर कुत्तों के झुंड द्वारा हमला किए जाने की घटनाएं सामने आ रही हैं। कई मामलों में ये हमले जानलेवा साबित हुए हैं, लेकिन इसके बावजूद स्थानीय प्रशासन की ओर से प्रभावी कार्रवाई नहीं हो रही।
⚖️ प्रशासन की निष्क्रियता पर सुप्रीम कोर्ट की नाराज़गी
सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि आवारा कुत्तों के हमलों पर सुप्रीम कोर्ट बार-बार सरकारों को चेतावनी दे चुका है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कोई ठोस बदलाव नजर नहीं आता। अधिकारियों की लापरवाही के कारण यह समस्या समय के साथ और गंभीर होती चली गई है।
💰 कुत्तों के काटने पर राज्य सरकार पर मुआवजा
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर उस मामले में जहां कुत्तों के काटने से बच्चों या बुजुर्गों को नुकसान होता है, राज्य सरकार को जवाबदेह ठहराया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार का संवैधानिक दायित्व है।
🍲 कुत्तों को खाना खिलाने वालों पर भी सवाल
आवारा कुत्तों के हमलों पर सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों को भोजन कराने की प्रवृत्ति पर भी सख्त टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि पशु-प्रेम के नाम पर आम लोगों की जान को खतरे में नहीं डाला जा सकता। यदि किसी को कुत्तों से इतना लगाव है, तो उन्हें अपने निजी परिसर में रखें।
🐾 नसबंदी को बताया गया सही समाधान
पशु-कल्याण संगठनों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने अदालत में दलील दी कि आवारा कुत्तों के हमले पर सुप्रीम कोर्ट को दीर्घकालिक समाधान पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि कुत्तों को मारना समाधान नहीं है, बल्कि नसबंदी (Sterilisation) ही एक प्रभावी और मानवीय तरीका है।
📜 Animal Birth Control (ABC) नियमों का जिक्र
गुरुस्वामी ने कहा कि ABC नियम केवल कुत्तों की संख्या नियंत्रित करने के लिए नहीं बने हैं, बल्कि उन्हें क्रूरता और अनावश्यक कैद से बचाने के लिए भी हैं। आवारा कुत्तों के हमले पर सुप्रीम कोर्ट के सामने उन्होंने यह भी कहा कि सरकारी फंड का सही उपयोग नहीं हो रहा।
❤️ भावनाओं और सुरक्षा के बीच संतुलन
इस मामले में भावनात्मक बहस भी देखने को मिली। जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि अब तक संवेदनाएं केवल जानवरों के लिए दिखाई दे रही हैं। इस पर जवाब देते हुए कहा गया कि आवारा कुत्तों के हमलों पर सुप्रीम कोर्ट का उद्देश्य इंसानों और जानवरों—दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
🏛️ कोर्ट रूम को बहस का मंच न बनाने की चेतावनी
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कोर्ट रूम को सार्वजनिक बहस का मंच नहीं बनाया जाना चाहिए। आवारा कुत्तों के हमले पर सुप्रीम कोर्ट प्रशासन को जवाबदेह ठहराकर ठोस प्रक्रिया शुरू करना चाहता है।
🔍 आगे क्या हो सकता है?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि आवारा कुत्तों के हमलों पर सुप्रीम कोर्ट की यह सख्ती राज्य सरकारों और नगर निगमों पर दबाव बढ़ाएगी। आने वाले समय में नसबंदी कार्यक्रमों और सार्वजनिक सुरक्षा को लेकर सख्त दिशा-निर्देश जारी हो सकते हैं।
✅ निष्कर्ष
आवारा कुत्तों के हमले पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी ने यह साफ कर दिया है कि अब नागरिकों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा। बच्चों और बुजुर्गों की जान को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए अदालत ने राज्य सरकारों को चेताया है कि लापरवाही की कीमत चुकानी पड़ेगी।

