वंदे मातरम नए नियम: सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत को लेकर केंद्र की नई गाइडलाइन

वंदे मातरम नए नियम: सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत को लेकर केंद्र की नई गाइडलाइन

Spread the love

शीर्षक: वंदे मातरम पर केंद्र सरकार के नए दिशानिर्देश: सम्मान, परंपरा और राजनीति के बीच राष्ट्रगीत की नई भूमिका

वंदे मातरम नए नियम को लेकर केंद्र सरकार ने हाल ही में विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिनके अनुसार अब सरकारी कार्यक्रमों, आधिकारिक आयोजनों और सरकारी शिक्षण संस्थानों में राष्ट्रगीत वंदे मातरम बजाना अनिवार्य होगा। साथ ही इसके दौरान उपस्थित सभी लोगों को सम्मान स्वरूप सावधान मुद्रा में खड़ा रहना होगा। सरकार का कहना है कि इन नियमों का उद्देश्य राष्ट्रगीत के प्रति सम्मान और राष्ट्रीय एकता की भावना को और मजबूत करना है।


वंदे मातरम नए नियम क्या कहते हैं

गृह मंत्रालय द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार, अब कई आधिकारिक अवसरों पर वंदे मातरम बजाना अनिवार्य किया गया है। इसमें राष्ट्रीय समारोह, सरकारी संस्थानों के कार्यक्रम, पुरस्कार वितरण समारोह और उच्च संवैधानिक पदाधिकारियों की उपस्थिति वाले आयोजन शामिल हैं।

यदि किसी कार्यक्रम में राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत दोनों प्रस्तुत किए जाते हैं, तो पहले वंदे मातरम और उसके बाद राष्ट्रगान बजाया जाएगा। इस दौरान सभी लोगों को खड़े रहकर सम्मान देना अनिवार्य होगा।


पूरा संस्करण बजाने का निर्देश

अब तक सामान्यतः वंदे मातरम के केवल पहले दो अंतरे ही गाए जाते थे, लेकिन नए नियमों के तहत पूरा संस्करण बजाने की बात कही गई है। यह पूर्ण संस्करण लगभग 3 मिनट 10 सेकंड का होता है और इसमें मूल गीत के सभी छह अंतरे शामिल हैं।

सरकार का मानना है कि पूरा संस्करण प्रस्तुत करने से गीत की साहित्यिक और सांस्कृतिक गरिमा पूर्ण रूप से सामने आएगी।


किन मौकों पर अनिवार्य होगा राष्ट्रगीत

नए दिशानिर्देशों के अनुसार निम्न अवसरों पर वंदे मातरम बजाना आवश्यक होगा:

  • तिरंगा फहराने के सरकारी समारोह
  • राष्ट्रपति के आगमन या संबोधन के अवसर
  • राज्यपालों के आधिकारिक कार्यक्रम
  • राष्ट्रीय महत्व के सरकारी आयोजन
  • सिविलियन सम्मान समारोह जैसे पद्म पुरस्कार

इन अवसरों पर राष्ट्रगीत का प्रस्तुतीकरण अब औपचारिक प्रोटोकॉल का हिस्सा होगा।


सिनेमा हॉल और निजी आयोजनों पर लागू नहीं

सरकार ने स्पष्ट किया है कि ये नियम सिनेमा हॉल, निजी कार्यक्रमों या मनोरंजन स्थलों पर लागू नहीं होंगे। यानी फिल्मों से पहले वंदे मातरम बजाना या दर्शकों का खड़ा होना अनिवार्य नहीं किया गया है।

अधिकारियों के अनुसार यह फैसला इसलिए लिया गया ताकि नियम केवल औपचारिक और सरकारी संदर्भों तक सीमित रहें और आम जनजीवन में अनावश्यक विवाद की स्थिति न बने।


वंदे मातरम का ऐतिहासिक महत्व

वंदे मातरम भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का प्रेरणास्रोत रहा है। इसे महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1875 में लिखा था और 1882 में उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित हुआ।

1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार इसे सार्वजनिक मंच से गाया, जिसके बाद यह गीत स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बन गया। अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलनों में यह नारा लोगों को एकजुट करने का माध्यम बना।


इतिहास में क्यों सीमित किए गए थे अंतरे

1937 में इस गीत को लेकर कुछ राजनीतिक और सामाजिक विवाद सामने आए थे। उस समय कुछ नेताओं ने आशंका जताई थी कि गीत की भाषा और धार्मिक प्रतीक सभी समुदायों के लिए समान रूप से सहज नहीं हैं।

इसी कारण कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने निर्णय लिया कि सार्वजनिक कार्यक्रमों में केवल पहले दो अंतरे ही गाए जाएँ। इस निर्णय में उस समय के कई प्रमुख नेता शामिल थे।


राजनीतिक और सामाजिक बहस

हाल के वर्षों में वंदे मातरम को लेकर संसद और राजनीतिक मंचों पर बहस भी होती रही है। कुछ नेताओं का मानना है कि राष्ट्रगीत को राष्ट्रगान के समान सम्मान मिलना चाहिए, जबकि अन्य का कहना है कि ऐसे विषयों पर संवेदनशीलता और विविधता का ध्यान रखना जरूरी है।

विश्लेषकों का मानना है कि नए दिशानिर्देश स्पष्टता लाते हैं, जिससे भ्रम और विवाद कम हो सकते हैं।


सांस्कृतिक दृष्टि से महत्व

वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक है। इसमें मातृभूमि को देवी के रूप में चित्रित किया गया है और देशभक्ति की गहरी भावना व्यक्त होती है। यही कारण है कि यह गीत आज भी राष्ट्रीय गर्व, बलिदान और स्वतंत्रता संग्राम की याद दिलाता है।


निष्कर्ष

वंदे मातरम नए नियम सरकार की ओर से राष्ट्रगीत के सम्मान को लेकर एक स्पष्ट और औपचारिक ढांचा प्रदान करते हैं। इन निर्देशों से राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति अनुशासन और सम्मान की भावना को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

हालाँकि इस विषय पर अलग-अलग विचार हो सकते हैं, लेकिन यह तय है कि वंदे मातरम भारत की ऐतिहासिक विरासत और राष्ट्रीय पहचान का अभिन्न हिस्सा है। आने वाले समय में इन नियमों का प्रभाव और समाज की प्रतिक्रिया यह तय करेगी कि यह पहल कितनी प्रभावी साबित होती है।

डबरा कलश वितरण हादसा: घायल महिलाओं से मिलने ग्वालियर अस्पताल पहुंचे पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *