न खेत न मिट्टी: हवा में आलू की खेती ग्वालियर में बनी किसानों के लिए नई उम्मीद

हवा में आलू की खेती ग्वालियर में बनी किसानों के लिए नई उम्मीद

Spread the love

हवा में आलू की खेती ग्वालियर में अब सिर्फ प्रयोग नहीं रही, बल्कि किसानों के भविष्य की खेती बनती जा रही है। राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय, ग्वालियर के वैज्ञानिकों ने एरोपोनिक तकनीक के जरिए बिना मिट्टी और बिना खेत के आलू का बीज तैयार कर दिखा दिया है कि आधुनिक कृषि क्या कर सकती है।

इस तकनीक से तैयार बीज न केवल पूरी तरह बीमारी-मुक्त हैं, बल्कि उत्पादन क्षमता भी चौंकाने वाली है। वैज्ञानिकों के अनुसार, 1 किलो एरोपोनिक बीज से लगभग 400 किलो आलू की फसल प्राप्त की जा सकती है।

हवा मैं आलू की खेती की क्या है एरोपोनिक तकनीक?

एरोपोनिक तकनीक खेती का एक हाई-टेक तरीका है, जिसमें पौधों की जड़ें मिट्टी में नहीं बल्कि हवा में लटकी रहती हैं। इन्हें पोषण देने के लिए न्यूट्रिएंट-युक्त पानी की बारीक फुहार (फॉगिंग सिस्टम) का उपयोग किया जाता है।

इसी तकनीक के जरिए हवा में आलू की खेती ग्वालियर में संभव हो पाई है।

टिशू कल्चर से शुरू होती है पूरी प्रक्रिया

हवा मैं आलू की खेती की शुरुआत आधुनिक लैब से होती है।
टिशू कल्चर तकनीक के माध्यम से आलू के पौधे तैयार किए जाते हैं। इसके बाद उन्हें विशेष एरोपोनिक यूनिट में ट्रांसप्लांट किया जाता है।

यहाँ पौधों की जड़ों को नियंत्रित वातावरण में पोषक तत्व दिए जाते हैं, जिससे मिनी ट्यूबर (बीज आलू) तैयार होते हैं, जिनका वजन केवल 2–3 ग्राम होता है लेकिन ताकत जबरदस्त होती है।

क्यों खास हैं एरोपोनिक आलू के बीज?

  • ✅ पूरी तरह रोग और वायरस-मुक्त
  • ✅ बीज की गुणवत्ता बेहद उच्च
  • ✅ उत्पादन क्षमता पारंपरिक बीज से कई गुना
  • ✅ कम वजन, आसान स्टोरेज और ट्रांसपोर्ट
  • ✅ किसानों को अलग-अलग किस्मों का विकल्प

इसी वजह से हवा में आलू की खेती ग्वालियर समेत देशभर के कृषि विशेषज्ञों के लिए चर्चा का विषय बन चुकी है।

किसानों के लिए कैसे फायदेमंद है यह तकनीक?

जब बीज स्वस्थ होगा, तो फसल भी बेहतर होगी।
ग्वालियर कृषि विश्वविद्यालय लगभग 20 अलग-अलग किस्मों के आलू बीज तैयार कर रहा है —
जैसे चिप्स, फ्रेंच फ्राई और टेबल उपयोग के लिए अलग-अलग वैरायटी।


इससे किसानों को अपनी जरूरत और बाजार के हिसाब से फसल उगाने का मौका मिलेगा।

बीज किसानों तक पहुंचने से पहले किन चरणों से गुजरता है?

एरोपोनिक बीज उत्पादन तीन चरणों में पूरा होता है:
G-0 स्टेज – लैब में टिशू कल्चर से पौधा
G-1 स्टेज – नेट हाउस में मिनी ट्यूबर की ग्रोथ
G-2 स्टेज – खेत में बोने योग्य बीज तैयार
इसके बाद ही यह बीज किसानों को उपलब्ध कराया जाता है।

भविष्य में कितनी बड़ी हो सकती है यह क्रांति?

वैज्ञानिकों के अनुसार आने वाले 2 वर्षों में बड़े पैमाने पर बीज उत्पादन संभव होगा।
एरोपोनिक यूनिट लगभग 5–7 साल तक चलती है और किसान खुद भी इसे व्यवसाय के रूप में अपना सकते हैं।
यानी हवा में आलू की खेती ग्वालियर सिर्फ रिसर्च नहीं, बल्कि आने वाले समय की स्मार्ट खेती है।

balam kheera ke fayde: बालम खीरा: पथरी, पीलिया और मलेरिया में फायदेमंद प्राकृतिक औषधि

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *