हरिद्वार ऋषिकेश मंदिर ड्रेसकोड इन दिनों श्रद्धालुओं और तीर्थ यात्रियों के बीच चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है। उत्तराखंड के इन दोनों प्रमुख धार्मिक नगरों में कई मंदिरों के बाहर ऐसे पोस्टर लगाए गए हैं जिनमें साफ तौर पर लिखा है कि मंदिर परिसर में प्रवेश करने से पहले सभी श्रद्धालु मर्यादित वस्त्र पहनें। छोटे या अनुचित माने जाने वाले कपड़ों में आने वालों से अनुरोध किया गया है कि वे बाहर से ही दर्शन कर सहयोग दें। मंदिर प्रशासन का कहना है कि यह पहल धार्मिक स्थलों की गरिमा और पारंपरिक संस्कृति को बनाए रखने के उद्देश्य से की गई है।
मंदिरों के बाहर लगाए गए सख्त संदेश
हरिद्वार और ऋषिकेश के प्रमुख मंदिरों के प्रवेश द्वारों पर लगे पोस्टरों में पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान निर्देश दिए गए हैं। इनमें स्पष्ट उल्लेख है कि हाफ पैंट, बरमूडा, मिनी स्कर्ट, नाइट सूट, कटी-फटी जींस या अन्य छोटे वस्त्र पहनकर मंदिर में प्रवेश न करें। यदि कोई श्रद्धालु ऐसे परिधान में आता है, तो उसे मंदिर के अंदर जाने के बजाय बाहर से ही दर्शन करने का अनुरोध किया गया है।
मंदिर प्रबंधन का कहना है कि यह प्रतिबंध किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं बल्कि धार्मिक अनुशासन बनाए रखने के लिए है। उनका उद्देश्य केवल इतना है कि मंदिर में आने वाला हर व्यक्ति उस वातावरण के अनुरूप आचरण और वेशभूषा अपनाए।
धार्मिक स्थलों की गरिमा बनाए रखने का प्रयास
मंदिरों से जुड़े संतों और प्रबंधकों का मानना है कि धार्मिक स्थल पर्यटन स्थल नहीं बल्कि आध्यात्मिक साधना के केंद्र होते हैं। यहां आने वाले व्यक्ति को मन, वचन और कर्म से पवित्र भाव रखना चाहिए। उनका कहना है कि जब श्रद्धालु शालीन वस्त्र पहनकर मंदिर आते हैं तो इससे वातावरण में श्रद्धा और शांति का भाव बढ़ता है।
दक्षेश्वर प्रजापति महादेव मंदिर से जुड़े संतों ने भी श्रद्धालुओं से अपील की है कि मंदिर जाने से पहले अपनी वेशभूषा, व्यवहार और भावनाओं को संयमित रखें। उनका कहना है कि मंदिर मनोरंजन का स्थान नहीं बल्कि आत्मिक शांति का माध्यम है।
बच्चों में धार्मिक संस्कार की बात
मंदिर प्रबंधन ने अभिभावकों से विशेष आग्रह किया है कि वे अपने बच्चों को धार्मिक स्थलों के नियमों और मर्यादाओं के बारे में पहले से ही जागरूक करें। उनका मानना है कि बचपन से यदि बच्चों को मंदिर की परंपराओं और अनुशासन की जानकारी होगी, तो वे बड़े होकर स्वयं इन नियमों का सम्मान करेंगे।
संतों का कहना है कि कई बार युवा या महिलाएं अनजाने में आधुनिक फैशन के अनुसार कपड़े पहनकर मंदिर पहुंच जाते हैं, जिससे बाद में विवाद या आलोचना की स्थिति बनती है। इसलिए पहले से स्पष्ट निर्देश देना ही बेहतर उपाय है।
ऋषिकेश के मंदिरों में भी लागू नियम
यह पहल केवल हरिद्वार तक सीमित नहीं है। ऋषिकेश के कई प्रमुख मंदिरों, जिनमें इस्कॉन मंदिर भी शामिल है, के बाहर इसी प्रकार के ड्रेसकोड पोस्टर लगाए गए हैं। इन संदेशों में लिखा है कि भारतीय संस्कृति की रक्षा करना हम सभी की जिम्मेदारी है और मंदिर में प्रवेश करते समय मर्यादित परिधान पहनना उसी का हिस्सा है।
धार्मिक संस्थाओं का मानना है कि ऋषिकेश और हरिद्वार अंतरराष्ट्रीय स्तर के तीर्थस्थल हैं, जहां देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं। ऐसे में स्पष्ट नियम होने से सभी लोगों को मंदिर की परंपराओं को समझने में सुविधा होती है।
पहले भी चल चुका है जागरूकता अभियान
मंदिर प्रशासन का कहना है कि हरिद्वार ऋषिकेश मंदिर ड्रेसकोड कोई अचानक लिया गया निर्णय नहीं है। इससे पहले भी समय-समय पर इस विषय पर जागरूकता अभियान चलाए गए थे। अब फिर से इसे प्रभावी तरीके से लागू करने की कोशिश की जा रही है।
संतों ने अन्य मंदिर समितियों, आश्रमों और मंदिर बोर्डों से भी अपील की है कि वे अपने यहां भी ऐसे निर्देश जारी करें ताकि सभी धार्मिक स्थलों पर एक समान मर्यादा बनी रहे। उनका मानना है कि धर्म का अर्थ ही मर्यादा और अनुशासन को जीवन में धारण करना है।
हरकी पैड़ी क्षेत्र में पुराने नियम की चर्चा
हाल ही में हरिद्वार के हरकी पैड़ी क्षेत्र में भी कुछ स्थानों पर “अहिंदू प्रवेश निषेध” से जुड़े बोर्ड लगाए जाने की खबर सामने आई है। गंगा सभा के अनुसार यह कोई नया नियम नहीं बल्कि 1916 के नगर पालिका उपनियम में पहले से मौजूद प्रावधान है। अब 2027 में होने वाले कुंभ मेले को ध्यान में रखते हुए इस नियम को सख्ती से लागू करने की मांग की जा रही है।
प्रबंधन का कहना है कि इसका उद्देश्य किसी समुदाय को अलग करना नहीं बल्कि क्षेत्र की धार्मिक पहचान और परंपरा को सुरक्षित रखना है।
रील्स और ड्रोन पर भी नियंत्रण
धार्मिक वातावरण बनाए रखने के लिए हरकी पैड़ी क्षेत्र में फिल्मी गानों पर रील बनाने और बिना अनुमति ड्रोन उड़ाने पर भी प्रतिबंध की चेतावनी दी गई है। संतों का मानना है कि ऐसी गतिविधियों से तीर्थस्थल की शांति और पवित्रता प्रभावित होती है। नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की भी बात कही गई है।
समाज में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं
इस पहल को लेकर लोगों की राय अलग-अलग है। कुछ लोग इसे संस्कृति और परंपरा की रक्षा के लिए आवश्यक कदम मानते हैं, तो कुछ इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़कर देखते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया भर के धार्मिक स्थलों में ड्रेसकोड सामान्य बात है और इसका उद्देश्य केवल उस स्थान की पवित्रता बनाए रखना होता है।
निष्कर्ष
हरिद्वार ऋषिकेश मंदिर ड्रेसकोड पहल केवल कपड़ों से संबंधित नियम नहीं बल्कि धार्मिक स्थलों की परंपरा, अनुशासन और आध्यात्मिक वातावरण को बनाए रखने का प्रयास है। मंदिर प्रबंधन का कहना है कि उनका मकसद किसी को रोकना नहीं बल्कि श्रद्धालुओं को मर्यादा का महत्व समझाना है। यदि श्रद्धालु इन निर्देशों का सम्मान करते हैं, तो इससे न केवल मंदिरों की गरिमा बनी रहेगी बल्कि तीर्थस्थलों का आध्यात्मिक वातावरण भी और अधिक सशक्त होगा।
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