कासगंज छेड़खानी केस: हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, जानिए पूरा घटनाक्रम
नाड़ा खींचना रेप की कोशिश — यह टिप्पणी अब देश की न्यायिक बहस का अहम हिस्सा बन चुकी है। उत्तर प्रदेश के कासगंज से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी नाबालिग लड़की के कपड़ों का नाड़ा तोड़ना, निजी अंगों को पकड़ना और जबरन सुनसान स्थान पर ले जाने की कोशिश को हल्के में नहीं लिया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे कृत्य ‘रेप की तैयारी’ नहीं बल्कि ‘रेप की कोशिश’ के दायरे में आ सकते हैं।
क्या था पूरा मामला?
साल 2021 में कासगंज जिले में एक 14 वर्षीय बच्ची के साथ छेड़खानी का आरोप लगा। मां की शिकायत के आधार पर आरोपियों के खिलाफ IPC की धारा 376, 354, 354B और POCSO एक्ट की धारा 18 के तहत मुकदमा दर्ज हुआ।
मामला बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा, जहां मार्च 2025 में सिंगल बेंच ने कहा कि पायजामे का नाड़ा तोड़ना और लड़की को खींचना ‘रेप’ या ‘अटेम्प्ट टू रेप’ नहीं बल्कि ‘रेप की तैयारी’ माना जाएगा। अदालत ने गंभीर धाराएं हटाकर कम गंभीर धाराओं में सुनवाई का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों जताई आपत्ति?
हाईकोर्ट के फैसले पर व्यापक विरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया। 25 मार्च 2025 को शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी।
तत्कालीन CJI बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली बेंच ने टिप्पणी की कि फैसले में इस्तेमाल भाषा असंवेदनशील प्रतीत होती है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में न्यायिक टिप्पणियां पीड़िता पर ‘चिलिंग इफेक्ट’ डाल सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि नाबालिग के साथ इस प्रकार की हरकतें गंभीर अपराध की श्रेणी में आती हैं और इन्हें केवल ‘तैयारी’ कहकर कमतर नहीं आंका जा सकता।
कानूनी दृष्टि से क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
यह मामला सिर्फ एक आपराधिक केस नहीं, बल्कि न्यायिक संवेदनशीलता का भी प्रश्न बन गया। ‘नाड़ा खींचना रेप की कोशिश’ जैसी टिप्पणी ने यह स्पष्ट कर दिया कि अदालतें यौन अपराधों से जुड़े मामलों में सख्त और संवेदनशील रुख अपनाने की अपेक्षा रखती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई के दौरान मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है।
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