ग्वालियर की 129 सड़कों की जमीनी स्थिति की जांच अब हाईकोर्ट की निगरानी में की जाएगी । शहर की बदहाल सड़कों को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच सख्त नजर आ रही है। ग्वालियर की सड़कों के निर्माण, मरम्मत और पैचवर्क पर पिछले पांच वर्षों में हुए खर्च और काम की वास्तविक स्थिति की जांच अब जमीनी स्तर पर की जाएगी। इस मामले में नगर निगम को पिछले पांच वर्षों से जुड़े दस्तावेज हाईकोर्ट के सामने पेश करने पड़े हैं।
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 129 सड़कों को लेकर रिकॉर्ड और जमीन पर उनकी वास्तविक स्थिति के बीच अंतर की जांच की जा रही है। हाईकोर्ट ने इस काम के लिए विशेष जांच व्यवस्था बनाई है, जिसके तहत रिकॉर्ड में किए गए निर्माण और मरम्मत के दावों का मौके पर जाकर सत्यापन किया जाएगा।
ग्वालियर की 129 सड़कों की जांच – मिनी ट्रक में पहुंचा पांच साल का रिकॉर्ड
सड़कों से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान ग्वालियर नगर निगम के अधिकारी बड़ी मात्रा में दस्तावेज लेकर हाईकोर्ट पहुंचे। रिपोर्टों के मुताबिक, इन रिकॉर्ड में वर्ष 2021 से 2026 के बीच सड़क निर्माण, मरम्मत, पैचवर्क और संबंधित कार्यों पर किए गए खर्च की जानकारी शामिल है।
इतने अधिक दस्तावेज थे कि उन्हें मिनी ट्रक के जरिए हाईकोर्ट तक पहुंचाया गया। अब इन रिकॉर्ड का मौके पर मौजूद सड़कों की स्थिति से मिलान किया जाएगा।
ग्वालियर की 129 सड़कों की जमीनी जांच क्यों?
हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह है कि जिन सड़कों के निर्माण या मरम्मत पर सरकारी राशि खर्च होने का रिकॉर्ड मौजूद है, उनकी वर्तमान स्थिति वास्तव में कैसी है।
जांच के दौरान यह देखा जाएगा कि:
- सड़क का निर्माण रिकॉर्ड के मुताबिक हुआ या नहीं।
- मरम्मत या पैचवर्क वास्तव में कराया गया या नहीं।
- सड़क की वर्तमान स्थिति कैसी है।
- निर्माण में निर्धारित गुणवत्ता और मानकों का पालन हुआ या नहीं।
- सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज खर्च और जमीन पर हुए काम में कोई अंतर तो नहीं है।
इस तरह जांच केवल फाइलों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि सड़कों की वास्तविक स्थिति भी सामने आएगी।
62 सड़कें चलने लायक बताई गईं
उपलब्ध रिपोर्टिंग के अनुसार जांच की गई 129 सड़कों में 62 सड़कें चलने लायक बताई गई हैं। वहीं 24 सड़कें पूरी तरह क्षतिग्रस्त और 34 सड़कें आंशिक रूप से खराब बताई गई हैं। इन आंकड़ों को लेकर आगे होने वाली जमीनी जांच महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि अंतिम स्थिति मौके के निरीक्षण और रिकॉर्ड के मिलान के बाद ज्यादा स्पष्ट होगी।
हाईकोर्ट ने बनाई विशेष जांच कमेटी
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने सड़कों की जमीनी स्थिति की जांच के लिए विशेष कमेटी गठित की है। कमेटी का उद्देश्य नगर निगम के रिकॉर्ड में दर्ज जानकारी और मौके पर मौजूद वास्तविक स्थिति का मिलान करना है।
जांच के दौरान सड़क की गुणवत्ता को भी देखा जाएगा। रिपोर्टों के अनुसार तकनीकी विशेषज्ञों की मदद से जरूरत पड़ने पर सड़क की खुदाई कर निर्माण की गुणवत्ता और इस्तेमाल की गई सामग्री की जांच भी की जा सकती है।
निगम के अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल
ग्वालियर की सड़कों का मामला केवल सड़क निर्माण तक सीमित नहीं है। इससे नगर निगम के कामकाज और जवाबदेही पर भी सवाल उठ रहे हैं।
इससे पहले हाईकोर्ट ने सड़क धंसने के मामले में जिम्मेदारी तय किए गए एक अधिकारी को दोबारा महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दिए जाने पर भी नगर निगम से सवाल किए थे। अदालत ने पूछा था कि क्या निगम में ऐसे सक्षम अधिकारी नहीं हैं जिनका रिकॉर्ड साफ हो।
इससे संकेत मिलता है कि अदालत सड़क निर्माण के साथ-साथ प्रशासनिक जवाबदेही के पहलू को भी गंभीरता से देख रही है।
अब फाइलों और जमीन की सच्चाई होगी आमने-सामने
ग्वालियर के इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण चरण अब जमीनी जांच का है। नगर निगम के रिकॉर्ड में जिस सड़क पर निर्माण, मरम्मत या पैचवर्क का दावा किया गया है, कमेटी मौके पर जाकर उसकी वास्तविक स्थिति देखेगी।
यदि रिकॉर्ड और जमीन की स्थिति में अंतर मिलता है, तो संबंधित कार्यों और खर्च को लेकर आगे सवाल उठ सकते हैं। वहीं यदि रिकॉर्ड और मौके की स्थिति सही पाई जाती है, तो इससे निगम के दावों की पुष्टि भी होगी।
ग्वालियर के लोगों की नजर जांच रिपोर्ट पर
ग्वालियर शहर में टूटी सड़कों और गड्ढों को लेकर लंबे समय से नागरिकों की शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे में हाईकोर्ट की निगरानी में होने वाली यह जांच आम लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण है।
अब लोगों की नजर इस बात पर रहेगी कि जांच कमेटी 129 सड़कों की वास्तविक स्थिति के बारे में क्या रिपोर्ट देती है और हाईकोर्ट आगे क्या निर्देश जारी करता है।
स्रोत: [मध्य प्रदेश हाईकोर्ट]
निष्कर्ष
ग्वालियर की 129 सड़कों की जमीनी जांच शहर के सड़क निर्माण और रखरखाव से जुड़े दावों की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकती है। पांच वर्षों के रिकॉर्ड हाईकोर्ट के सामने पेश किए जा चुके हैं और अब रिकॉर्ड तथा जमीन पर मौजूद स्थिति का मिलान किया जाना है।
जांच पूरी होने के बाद यह स्पष्ट हो सकेगा कि सड़कों के निर्माण और मरम्मत पर किए गए सरकारी खर्च का कितना असर जमीन पर दिखाई देता है।
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